1 जनवरी 2019 - 14:11
अचानक तालेबान संगठन का बढ़ा महत्व, तेहरान का दौरा करके अमरीका और अरब देशों को क्या संदेश देना चाहता है संगठन?

अगर हम यह कहें कि नया साल एशिया में तालेबान के लिए महत्वपूर्ण साल होगा तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वर्ष 2018 के आख़िरी महीनों में जो परिवर्तन देखने में आए हैं उनसे साबित हो गया है कि महत्वपूर्ण शक्तियां तालेबान से वार्ता करना चाहती हैं।

अमरीकी सरकार भी तालेबान से वार्ता कर रही है, अरब देश भी तालेबान से वार्ता कर रहे हैं जबकि इस्लामी गणतंत्र ईरान ने भी घोषणा की है कि वह अफ़ग़ान सरकार को विश्वास में लेकर तालेबान से वार्ता कर रहा है। तालेबान से ईरान की बातचीत की घोषणा से अमरीका और अरब देशों को गहरा झटका लगा है।

सोमवार को यह ख़बर आई कि तालेबान का प्रतिनिधि मंडल तेहरान की यात्रा पर पहुंचा और ईरानी अधिकारियों से उसकी बातचीत हुई। यह वार्ता रविवार को हुई। इस्लामी गणतंत्र ईरान की कोशिश यह है कि पड़ोसी देशों में शांति वार्ता को आगे बढ़ाए ताकि विध्वंसकारी तत्वों को अशांति फैलाने का मौक़ा न मिले। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बहराम क़ासेमी ने कहा कि यह वार्ता अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को सूचित करके आयोजित की गई है और इसका लक्ष्य अफ़ग़ान सरकार और तालेबान के बीच वार्ता का रोडमैप तैयार करना है।

इस समय तालेबान से दो चैनलों से बातचीत हो रही है। एक वार्ता क़तर की राजधानी दोहा में हो रही थी जिसे अचानक दोहा से अबू धाबी स्थानान्तरित कर दिया गया। यह वार्ता अमरीका के विशेष दूत ज़लमै ख़लीलज़ाद से हो रही है। इस वार्ता का लक्ष्य अप्रैल 2019 में राष्ट्रपति व संसदीय चुनावों से पहले कोई शांति समझौता करना बताया जाता है ताकि अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों के बाहर निकलने का रास्ता समतल हो सके।

दूसरी वार्ता तेहरान में हो रही है जो अफ़ग़ान सरकार और तालेबान के बीच तालमेल बनाने के लिए है जिसमें अमरीका की कोई मध्यस्थता न हो ताकि अफ़ग़ानिस्तान में आंतरिक संधि बने और अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता स्थापित हो। इस बीच ईरान, भारत और पाकिस्तान की चिंता यह है कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर दाइश जैसे आतंकी संगठनों पर अंकुश लगाया जाए और इस लक्ष्य के लिए यह देश संयुक्त रूप से प्रयास करें।

अफग़ानिस्तान में अपने 2200 सैनिकों के मारे जाने के बाद अब अमरीका इस देश से अपने सभी सैनिकों को निकालने की तैयारी में है। आने वाले तीन महीनों में अमरीका अपने 14 हज़ार सैनिकों में से 7 हज़ार सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान से वापस बुला सकता है। अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका के दो ट्रिलियन डालर ख़र्च हो चुके हैं और इस देश से सारे सैनिकों को वापस बुलाने का मतलब यह होगा कि उसने इस देश में अपने मिशन की नाकामी को स्वीकार कर लिया है।

ईरान और तालेबान के बीच वार्ता अमरीकी प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि ईरान की घोषित नीति यह है कि क्षेत्रीय मामलों को क्षेत्रीय देशों के हाथों निपटाया जाना चाहिए बाहरी शक्तियों को इसमें हस्तक्षेप का मौक़ा नहीं दिया जाना चाहिए।

अमरीका की कोशिश यह थी कि यदि तालेबान से वार्ता हो तो इस प्रक्रिया में अमरीका की स्थिति अभिभावक की हो और वार्ता उसी की निगरानी में हो मगर अमरीका के रिकार्ड को देखते हुए कोई भी पक्ष उस पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है इस बीच ईरान की पहल तालेबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच समन्वय और वार्ता की ओर केन्द्रित है जो तालेबान और अफ़गान सरकार दोनों के लिए एक अच्छा विकल्प है। इस स्थिति में अमरीका के पास वार्ता को हाई जैक करने का कोई मौक़ा नहीं रहेगा। तालेबान ने यह बात स्पष्ट रूप से कही है कि अमरीका को सबसे पहले अपने सारे सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकाल लेना चाहिए। इसका मतलब यही है कि अफ़ग़ानिस्तान से भी अमरीका बिलकुल ख़ाली हाथ लौटने पर मजबूर है। तालेबान ने तो यहां तक धमकी दी  है कि यदि अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सारे सैनिक बाहर न निकाले तो उसका अंजाम भी सोवियत संघ जैसा होगा।

साभार रायुल यौम